समकालीन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘कुकुरमुत्ता’ की प्रासंगिकता : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Authors

  • डॉ. तबस्सुम खान अध्यक्ष, हिंदी विभाग, श्री सत्य साईं विश्वविद्यालय, सीहोर, मध्य प्रदेश Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i3.25

Keywords:

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, कुकुरमुत्ता, सामाजिक चेतना, आर्थिक विषमता, वर्ग-संघर्ष, व्यंग्य, पूँजीवाद, समकालीन प्रासंगिकता।

Abstract

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख रचनाकारों में से एक हैं। उनकी कविता में सामाजिक चेतना, विद्रोह, मानवीय संवेदना, शोषण के प्रति प्रतिरोध तथा रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष की भावना प्रमुखता से दिखाई देती है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘कुकुरमुत्ता’ हिंदी साहित्य में सामाजिक एवं आर्थिक विषमता पर व्यंग्य करने वाली महत्त्वपूर्ण रचना है। इस कविता के माध्यम से निराला ने सामाजिक प्रतिष्ठा, वर्गीय अहंकार, पूँजीवादी मानसिकता और स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाए हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य निराला की कविता ‘कुकुरमुत्ता’ का समकालीन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में आलोचनात्मक अध्ययन करना है। वर्तमान समय में आर्थिक असमानता, उपभोक्तावादी संस्कृति, सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा तथा श्रम के मूल्यांकन से संबंधित अनेक प्रश्न विद्यमान हैं। ऐसे परिवेश में यह कविता विशेष प्रासंगिकता प्राप्त करती है। कविता का कुकुरमुत्ता अपने अस्तित्व और महत्त्व के आधार पर गुलाब जैसी प्रतिष्ठित वस्तु के सामने एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से निराला प्रकृति, सामाजिक व्यवस्था और मूल्यबोध से जुड़े प्रश्नों को व्यंग्यात्मक रूप में सामने लाते हैं। इस अध्ययन में पाठ-विश्लेषणात्मक एवं आलोचनात्मक पद्धति का प्रयोग किया गया है। शोध का प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि ‘कुकुरमुत्ता’ केवल अपने समय की सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य नहीं करती, बल्कि आधुनिक समाज में प्रचलित वर्गीय भेदभाव, प्रतिष्ठा की मानसिकता और आर्थिक विषमता को समझने के लिए भी उपयोगी साहित्यिक आधार प्रदान करती है।

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Published

2026-10-31

How to Cite

समकालीन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘कुकुरमुत्ता’ की प्रासंगिकता : एक आलोचनात्मक अध्ययन. (2026). The Research Dialogue, 5(3), 227-233. https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i3.25