सतत विकास एवं पर्यावरण-संरक्षण में बौद्ध दृष्टि ; एक दार्शनिक अनुशीलन
DOI:
https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i3.10Keywords:
सतत विकास, पर्यावरण-संरक्षण, बौद्ध दर्शन, प्रतीत्यसमुत्पाद, करुणा, अहिंसा, मध्यम मार्ग, पर्यावरणीय नैतिकता, पारिस्थितिक अंतर्संबद्धता, उत्तरदायी उपभोग।Abstract
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में पर्यावरणीय संकट मानव सभ्यता के समक्ष एक गंभीर अस्तित्वगत चुनौती के रूप में उपस्थित है। जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता का तीव्र ह्रास, प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन तथा उपभोक्तावादी जीवन-दृष्टि विकास की प्रचलित अवधारणाओं की सीमाओं को उजागर करते हैं। ऐसी परिस्थिति में सतत विकास की संकल्पना का परीक्षण केवल आर्थिक अथवा तकनीकी मानदंडों के आधार पर पर्याप्त नहीं है; इसके लिए दार्शनिक, नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्विचार भी आवश्यक है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य बौद्ध दर्शन की प्रमुख अवधारणाओं—प्रतीत्यसमुत्पाद, करुणा, अहिंसा, मध्यम मार्ग तथा अल्पेच्छा—के आलोक में सतत विकास और पर्यावरण-संरक्षण का दार्शनिक अनुशीलन करना है। इस अध्ययन का मूल प्रतिपाद्य यह है कि पर्यावरणीय संकट को केवल प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता अथवा तकनीकी प्रबंधन की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता; इसके पीछे मानवीय तृष्णा, उपभोग-केंद्रित जीवन-दृष्टि और प्रकृति के प्रति प्रभुत्ववादी मानसिकता भी सक्रिय हैं। बौद्ध दृष्टि इस संकट के प्रत्युत्तर में नैतिक आत्मानुशासन, करुणामूलक आचरण, संयमित उपभोग तथा परस्पर निर्भरता की चेतना को महत्त्व देती है। विश्लेषणात्मक, व्याख्यात्मक और समालोचनात्मक पद्धति के आधार पर यह लेख इस संभावना का परीक्षण करता है कि बौद्ध दर्शन समकालीन सतत-विकास विमर्श को केवल नैतिक प्रेरणा ही नहीं, बल्कि मानव, समाज और प्रकृति के संबंधों को संतुलित सह-अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में समझने का दार्शनिक आधार भी प्रदान कर सकता है। इस दृष्टि से बौद्ध अवधारणाओं की समकालीन पुनर्व्याख्या पर्यावरणीय नैतिकता तथा व्यावहारिक नीतिगत विमर्श—दोनों के लिए प्रासंगिक है।