भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘लोक’ की अवधारणा: लोकतंत्र के प्राचीन भारतीय स्वरूप का विश्लेषण

Authors

  • सोनम अग्रवाल शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ Author
  • मनप्रीत कौर शोधार्थी, इतिहास विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ Author

DOI:

https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i3.09

Keywords:

लोक-परंपरा, प्राचीन भारतीय लोकतंत्र, सभा-समिति संरचना, लोक-कल्याण आधारित राजधर्म, भारतीय राजनीतिक दर्शन

Abstract

यह शोध-पत्र भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित ‘लोक’ की अवधारणा और उसके लोकतांत्रिक स्वरूप का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय चिंतन में ‘लोक’ केवल जनता का समूह नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन, सामाजिक न्याय, नैतिकता, कर्तव्य और लोक-कल्याण की व्यापक धारणा है। वेद उपनिषद, स्मृति-ग्रंथ, महाकाव्य, बौद्ध संघ तथा गणराज्य जैसी संस्थाएँ इस बात को सिद्ध करती हैं कि भारत में लोकतांत्रिक परंपरा अत्यंत प्राचीन और बहुआयामी रही है। वेदों में वर्णित सभा-समिति जैसी संस्थाएँ प्राचीन भारत में जनमत, विमर्श और सामूहिक निर्णय के प्रमुख केंद्र थे। इन संस्थाओं में समानता, सहमति और सहभागिता को सर्वाेच्च महत्व दिया जाता था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन था। ”लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु“ जैसे वैदिक मंत्र यह प्रमाणित करते हैं कि भारतीय शासन-व्यवस्था का मूल उद्देश्य लोकहित और लोक-कल्याण था। महाभारत, अर्थशास्त्र और धर्मसूत्रों में राजा को लोक-सेवक, लोक-पालक और जनकल्याण का संरक्षक बताया गया है। भारतीय राजधर्म में सत्ता को नैतिकता, धर्म और लोकहित के अधीन रखा गया, जो पाश्चात्य लोकतंत्र के अधिकार-केंद्रित मॉडल से भिन्न है। प्राचीन भारतीय गणराज्य और बौद्ध संघों में निर्णय प्रक्रिया विमर्श, सहयोग और बहस पर आधारित थी, जो आधुनिक लोकतंत्र की पूर्वपीठिका साबित होती है। पाश्चात्य लोकतंत्र की तुलना में भारतीय लोकतंत्र अधिक मानवीय, नैतिक और समावेशी था, जिसमें प्रकृति, समाज और सम्पूर्ण लोक के कल्याण को शासन का केंद्र माना गया।

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Published

2026-10-16

How to Cite

भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘लोक’ की अवधारणा: लोकतंत्र के प्राचीन भारतीय स्वरूप का विश्लेषण. (2026). The Research Dialogue, 5(3), 83-88. https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i3.09