The Research Dailogue

सामाजिक संरचना में लोकनृत्य की भूमिका

Vol. 05, Issue 01, pp. 641–645 |  Published: 15 April 2026
Author: डॉ. शालिनी वर्मा

DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i1.65

सारांश

लोकनृत्य समाज की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक व्यवस्था और सामूहिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। उत्तर भारत के लोकनृत्य सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों समाजों में लोकनृत्य लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने, सांस्कृतिक एकता स्थापित करने और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तोकनृत्य सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने में सहायक होते हैं। विवाह, जन्मोत्सव, फसल कटाई और धार्मिक पर्वो पर सामूहिक नृत्य लोगों के बीच आत्मीयता और पारिवारिक संबंधों को बढ़ाते हैं। लोकनृत्य समाज में धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं को भी सुदृढ़ करते हैं। लोकनृत्यों के माध्यम से ऐतिहासिक घटनाएँ, लोककथाएँ और सामाजिक अनुभव नई पीढ़ी तक पहुँचते हैं। ये समाज की मौखिक परम्परा को हिस्सा हैं, जो सांस्कृतिक ज्ञान को सुरक्षित रखते हैं। लोकनृत्यों का आध्यात्मिक पक्ष केवल देवी-देवताओं की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और प्रकृति के संबंध को भी दर्शाता है। इन लोकनृत्यों में स्त्री और पुरुष दोनों की भूमिकाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण रही हैं।

मुख्य शब्द  – लोकनृत्य, रासलीला, झिझिया नृत्य, पांडव नृत्य

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डॉ. शालिनी वर्मा, “सामाजिक संरचना में लोकनृत्य की भूमिकाThe Research Dialogue, Open Access Peer reviewed & Refereed Journal, Pp-641–645, Volume-05, Issue-01, April-2026, https://theresearchdialogue.com/

 

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