शोधार्थियों में डिजिटल साक्षरता: मुद्दे एवं समाधान
Author: राजकुमार
DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i1.04
सारांश
स्वामी विवेकानंद भारतीय शिक्षा और दर्शन के क्षेत्र में अद्वितीय दृष्टिकोण रखने वाले विचारक थे। उनका मानना था कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान का संचय नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के ’’संपूर्ण विकास का साधन’’ होनी चाहिए। उन्होंने शिक्षा को जीवन की शक्ति और चरित्र निर्माण का प्रमुख माध्यम माना। उनके अनुसार सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति के भीतर ’’छिपी हुई क्षमता और प्रतिभा को जाग्रत करे’’, उसे आत्मनिर्भर बनाए और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाए। स्वामी विवेकानंद के शैक्षिक विचारों की जड़ें ’’सनातन धर्म और वेदांत दर्शन’’ में हैं, जिसमें शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जन नहीं बल्कि ’’आत्मा का ज्ञान, सत्य की अनुभूति और परम चेतना से मिलन’’ है। विवेकानंद का दृष्टिकोण शिक्षा को ’’व्यक्तित्व निर्माण, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और आध्यात्मिक विकास’’ से जोड़ता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि यह विद्यार्थी में ’’शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन’’ विकसित करे। वे मानते थे कि ’’शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक तंदरुस्ती और आत्मनिर्भरता’’ शिक्षा का अभिन्न हिस्सा हैं। इसके साथ ही उन्होंने ’’चरित्र निर्माण’’ पर विशेष जोर दिया। उनके अनुसार शिक्षा का वास्तविक मूल्य तभी है जब यह व्यक्ति में ’’सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, साहस और सहानुभूति’’ जैसे गुणों का विकास करे। सनातन दर्शन में शिक्षा को जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य की प्राप्ति का साधन माना गया है। इसमें शिक्षा का लक्ष्य केवल ज्ञानार्जन नहीं बल्कि व्यक्ति के ’’आध्यात्मिक और नैतिक उत्थान’’ में योगदान देना है। स्वामी विवेकानंद ने इस दृष्टिकोण को आधुनिक शिक्षा में रूपांतरित किया और इसे ’’युवा वर्ग के सशक्तिकरण और समाज सुधार के साधन’’ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने शिक्षा में ’’व्यावहारिक ज्ञान, कौशल विकास और सामाजिक जागरूकता’’ का समावेश आवश्यक माना। उनका मानना था कि शिक्षक केवल जानकारी देने वाला नहीं बल्कि ’’मार्गदर्शक और प्रेरक’’ होना चाहिए, जो विद्यार्थियों में आत्मविश्वास और आत्मज्ञान का विकास करे। विवेकानंद का शिक्षण दर्शन आज भी प्रासंगिक है। उनके विचार युवाओं को ’’स्वावलंबी, सशक्त, नैतिक और सामाजिक रूप से जिम्मेदार’’ बनाने की दिशा में प्रेरित करते हैं। उन्होंने शिक्षा को न केवल व्यक्तिगत विकास का माध्यम माना, बल्कि इसे ’’राष्ट्र और समाज की प्रगति के लिए आवश्यक’’ बताया। उनका दृष्टिकोण यह संदेश देता है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य ’’मनुष्य के सर्वांगीण विकास, चरित्र निर्माण और आध्यात्मिक जागृति’’ में निहित है। इस प्रकार, स्वामी विवेकानंद की शैक्षिक विचारधारा और सनातन दर्शन का सम्मिलन शिक्षा को ’’ज्ञान, शक्ति, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी’’ का संपूर्ण माध्यम बनाता है। उनके शिक्षण और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल सूचना का संग्रह नहीं बल्कि ’’मानव जीवन के सशक्त, सुसंस्कृत और जिम्मेदार व्यक्तित्व का निर्माण’’ है। इस दृष्टिकोण को अपनाकर आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ’’व्यक्ति-केंद्रित, चरित्र-केंद्रित और समाज-केंद्रित शिक्षा’’ को बढ़ावा दिया जा सकता है।
Cite this Article:
राजकुमार, “स्वामी विवेकानंद की शैक्षिक विचार धारा और सनातन दर्शन”The Research Dialogue, Open Access Peer-reviewed & Refereed Journal, Pp.17–25,Volume-05, Issue-01, April-2026, https://theresearchdialogue.com/
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