The Research Dailogue

The Research Dialogue

(A Quarterly Multidisciplinary Peer-reviewed online Journal)

International Open Access, Peer-reviewed & Refereed Journal | ISSN : 2583-438X(Online)

वैदिक वांग्मय में पारिस्थितिक-दर्शन: पाठ्य विश्लेषण एवं समकालीन प्रासंगिकता

Vol. 05, Issue 01, pp. 360–364 |  Published: 21 July 2026

Author(s) : डॉ0 श्रवण कुमार शुक्ल1, डॉ0 भूपेश कुमार मिश्र2

DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i2.37

सारांश:

समकालीन वैश्विक पारिस्थितकीय संकट मानव केन्द्रित शोषण से हटकर पर्यावरण सह अस्तित्व की ओर बढ़ने की मांग करता है। आधुनिक पर्यावरणीय ढांचा राजनीतिक और तकनीकी समाधानों पर निर्भर है। इसमें स्थायी व्यावहारिक परिवर्तन के लिए नैतिक और दार्शनिक आधार की कमी है। प्रस्तुत शोध पत्र प्राचीन भारतीय वैदिक साहित्य (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अर्थववेद)में निहित पर्यावरणीय चेतना के वैचारिक ढाचे का अन्वेषण करता है। सम्प्रति बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता नगरीकरण, औद्योगीकरण, भोग-विलास वादी मानव प्रवृत्ति, विभिन्न प्रकार के प्रदूषण, घटते वन, एवं वन्यजीव, सिकुड़ता कृषि क्षेत्र, जल एवं ऊर्जा जैसे संसाधनों का गहराता संकट जैसे भयावह समस्याओं के समाधान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अक्षम हो रहे हैं। जबकि वैदिक ग्रन्थों में पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण निवारण और पर्यावरण चेतना का जो संदेश(प्राचीन भारतीय मनीषियों ने प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु न मानकर उसे दैवीय स्वरूप प्रदान किया था) है वह आज के संदर्भ में नितांत प्रासंगिक है, क्योंकि पृथ्वी, जल, वायु, वनस्पति और अंतरिक्ष आदि को देवता मानकर वैदिक दृष्टिकोण की विवेचना वर्तमान वैश्विक जलवायु संकट को कम करने में सहायक या मार्गदर्शक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। गुणात्मक पाठ्य विश्लेषण पद्धति का उपयोग करते हुए यह अध्ययन प्रकृति और मनुष्य के मध्य सहजीवी सम्बन्ध की व्याख्या करता है। इस प्रकार के अध्ययन से आधुनिक पर्यावरणीय शिक्षा और नीतिगत ढाँचे में वैदिक पारिस्थितिक दर्शन को एकीकृत करके वैश्विक सतत विकास के प्रति एक कर्तव्य केन्द्रित दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है।  

मुख्य शब्द: वैदिक काल, पर्यावरणीय चेतना, प्रकृति संरक्षण, सतत विकास, पंच महाभूत

Cite this Article

शुक्ल, डॉ0 श्रवण कुमार., मिश्र, डॉ0 भूपेश कुमार..(2026). वैदिक वांग्मय में पारिस्थितिक-दर्शन: पाठ्य विश्लेषण एवं समकालीन प्रासंगिकता.The Research Dialogue, 5(2), 360–364., Volume-05, Issue-02, July-2026.

DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i2.37

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