The Research Dailogue

छत्रपति शाहूजी महाराज का व्यावसायिक शिक्षा में योगदान : वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Vol. 05, Issue 01, Pp. 407–414 |  Published: 21 July 2026

Author(s): नीरज वर्मा1, डॉ० अखिलेश पटेल2

DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i2.43

सारांश (Abstract)

राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज (1874–1922) आधुनिक भारत के उन महान समाज सुधारकों एवं दूरदर्शी शासकों में से हैं जिन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक उन्नति तथा सामाजिक न्याय का सबसे प्रभावी साधन माना। उन्होंने यह अनुभव किया कि केवल सैद्धांतिक अथवा पारंपरिक शिक्षा समाज की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती। ऐसी शिक्षा आवश्यक है जो व्यक्ति को रोजगार, आत्मनिर्भरता तथा सम्मानजनक जीवन जीने की क्षमता प्रदान करे। इसी कारण उन्होंने अपने शासनकाल में व्यावसायिक, तकनीकी, औद्योगिक तथा कृषि शिक्षा के विकास पर विशेष बल दिया।

शाहूजी महाराज का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास तथा उसे उत्पादन एवं रोजगार से जोड़ना भी है। उन्होंने दलितों, पिछड़े वर्गों, किसानों, श्रमिकों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए छात्रवृत्ति, छात्रावास, निःशुल्क शिक्षा तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण की अनेक योजनाएँ प्रारम्भ कीं। उनके प्रयासों ने समाज के वंचित वर्गों को शिक्षा से जोड़ने के साथ-साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वर्तमान समय में जब भारत राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020, कौशल भारत मिशन, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया तथा आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से कौशल-आधारित एवं रोजगारोन्मुख शिक्षा पर बल दे रहा है, तब शाहूजी महाराज की शैक्षिक दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। प्रस्तुत शोध-पत्र में उनके व्यावसायिक शिक्षा संबंधी विचारों, नीतियों, कार्यक्रमों तथा उनके दीर्घकालीन प्रभावों का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।

मुख्य शब्द:  राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज, व्यावसायिक शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास, सामाजिक न्याय, आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय शिक्षा नीति।

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वर्मा, नीरज, पटेल, डॉ० अखिलेश . (2026). छत्रपति शाहूजी महाराज का व्यावसायिक शिक्षा में योगदान : वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक विश्लेषणात्मक अध्ययन.The Research Dialogue, 5(2), 407–414., Volume-05, Issue-02, July-2026. DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i2.43

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