The Research Dailogue

जैन दर्षन एवं योग की साधना पद्धति

Vol. 05, Issue 01, pp. 170–175 |  Published: 15 April 2026

Author :शशि शेखर 

DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i1.21

शोध सार-
भारतीय अध्यात्मवादी परंपरा में योग साधना का अस्तित्व प्राचीनकाल से रहा है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुहरों में ध्यान मुद्रा में जोगियो के अंकन पाये गये हैं। औपनिषदिक ऋषिगण और भ्रमण साधक अपनी वैदिक जीवन चर्चा में योग साधना को स्थान देते रहे हैं। महावीर स्वामी को ज्ञान का जो प्रकाश प्राप्त हुआ, वह उनकी योग साधना, ध्यान का ही परिणाम था। प्रेक्षाध्यान और विपश्यना जैन परंपराओं की उन्हीं पद्धतियों के आधुनिक रूप हंै। इसी योग समाधि के द्वारा वैदिक काल में कितने ही ब्रह्म उपासक मंत्रदृष्टा ऋषि बन गए, जिनका प्रमाण वेद की ऋचायें हैं। सूत्रकृतांग-सूत्र जैसे सबसे पुराने जैन धर्म ग्रंथों में योग और ध्यान का उपयोग संयम या संयम के अभ्यास को संदर्भित करता है। जिसे योगवान द्वारा मूर्त रूप दिया गया है। योगवान वह व्यक्ति है जिसके पास संयम है और जो ज्ञान योग, दर्शन योग और चरित्र योग में आधिकारिक है।
मुख्य शब्द-योग, जैन दर्शन, अष्टांग योग, ध्यान, ज्ञान योग, दर्शन योग, चरित्र योग, पंचशील सिद्धांत, चार प्राथमिक मार्ग (जैन धर्म)।

Cite this Article: 

शशि शेखर,जैन दर्षन एवं योग की साधना पद्धतिThe Research Dialogue, Open Access Peer-reviewed & Refereed Journal, Pp-170–175,Volume-05, Issue-01, April-2026, https://theresearchdialogue.com/

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