सामाजिक जीवन में भारतीय संस्कृति एवं योग की प्रासंगिकता
Author(s): डा. निशा
DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v4i4.21
सारांश
योग और भारतीय संस्कृति का गहरा संबंध है क्योंकि योग भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं का अहम् हिस्सा है । प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं से उत्पन्न हुआ एवं देश की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। सांस्कृतिक शक्ति के रूप में योग भारत के प्रति विश्व में एक सकारात्मक वातावरण निर्मित करने के साथ उसके बारे में अधिकाधिक जानने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहा है। यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान को पुष्ट और प्रतिष्ठित करने का काम कर रही है। संपूर्ण विश्व के लोग योग के साथ-साथ आसन, प्राणायाम, ध्यान, शांति आदि शब्दों से परिचित हो रहे हैं भारतीय संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं में अपना विश्वास प्रकट कर रहे हैं।इसका प्रमुख विषय आत्म साक्षात्कार है। वेद,उपनिषद, स्मृति, पुराण, भगवतगीता आदि सभी ग्रन्थों में योग के संदर्भ में उल्लेख है। इसकी अपनी विशेषता है कि यह केवल सैद्धांतिक ही नहीं बल्कि व्यावहारिक भी है। स्वस्थ शरीर तथा सबल आत्मा दोनों ही इसका प्रतिपाद्य विषय है। ”योगः कर्मसु कौशलम्“ अर्थात कर्मों में योग का नाम ही योग है। योग मूलतः एक अत्यंत सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित आध्यात्मिक अनुशासन है जो मन और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर केंद्रित है। यह स्वस्थ जीवन जीने की कला और विज्ञान है। योग शब्द संस्कृत के श्युज्श् धातु से बना है जिसका अर्थ जुड़ना, जोड़ना या एकजुट होना है।
भारत में योग का इतिहास 5000 साल से भी अधिक पुराना है जिसकी शुरुआत सिंधु सरस्वती सभ्यता से हुई थी। योग का पहला लिखित उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। अथर्ववेद में सांसों पर नियंत्रण के महत्व पर जोर दिया गया है। पतंजलि ने योगसूत्र लिखकर योग को एक व्यवस्थित वैज्ञानिक और सुसंगत रूप दिया जो आज भी योग का आधार है। वेदों में वर्णित योग केवल आसन या मुद्राओं का शारीरिक अभ्यास नहीं बल्कि एक समग्र प्रणाली है जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण को समाहित करती है। 21 जून को आदियोगी भगवान शिव ने अपने शिष्यों को योग का ज्ञान देना शुरू किया था। इसलिए यह दिवस योग का उद्गम भी कहलाता है। खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व के कारण ही 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
आज की तीव्र गति और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी दुनिया में युवा लोग अभूतपूर्व स्तर के तनाव, चिंता और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। शैक्षणिक प्रदर्शन, सोशल मीडिया और सामाजिक अपेक्षाओं का दबाव के कारण वे अभिभूत, अवसाद ग्रस्त और बर्नआउट की भावनाएं अनुभव करते हैं। ऐसी स्थिति में योग तनाव चिंता को कम करने और समग्र मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण सिद्ध हो सकता है। नियमित योग अभ्यास के माध्यम से युवा अपनी भावनाओं को प्रतिबंधित करना, अपनी आत्म जागरूकता बढ़ाना और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
भारतीयों ने हमेशा अपने जड़ों की उपेक्षा की है। हमने हमेशा अपने संस्कृति को हेय दृष्टि से देखा क्योंकि पश्चिम ने हमें बताया कि हम हीन और असभ्य हैं लेकिन अब इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है विश्व इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि तन मन को स्वस्थ रखने की यह विद्या मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में उपयोगी है यह विज्ञान सम्मत विद्या अपने नाम के अनुरूप विश्व को जोड़ने के साथ शांति एवं सद्भाव का संदेश देने का भी काम कर रही है इससे उत्तम और क्या होगा कि योग के माध्यम से एक खुशहाल विश्व का निर्माण हो और सर्वत्र यह भाव व्याप्त हो कि विश्व एक परिवार है। भारतीय संस्कृति का अभीष्ट भी यही है। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि वेद और योग के नियम और नैतिकता हमारे जीवन का मूल आधार है। भारत हमेशा सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और सभ्य रहा है योग को लोकप्रिय बनाने एवं उसकी महत्व से परिचित कराने का श्रेय भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को है क्योंकि उन्होंने ही संयुक्त राष्ट्र के मंच से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का आग्रह किया था। योग विश्व को भारत की एक ऐसी देन है जो किसी वरदान से कम नहीं है।
बीज शब्द-योग, आध्यात्मिक अनुशासन, समग्र प्रणाली, विज्ञान सम्मत विधा, आत्म जागरूकता
डा. निशा,“ सामाजिक जीवन में भारतीय संस्कृति एवं योग की प्रासंगिकता” The Research Dialogue, Open Access Peer-reviewed & Refereed Journal, Pp.164–168
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