समाज परिवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती
Author : डा. मिथलेश गंगवार
DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i1.29
सारांश
महर्षि दयानन्द ने वेदों को मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का आधार मानते हुए भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, मूर्तिपूजा, जातिगत भेदभाव, बालविवाह, सतीप्रथा तथा सामाजिक कुरीतियों का प्रबल विरोध किया। उन्होंने स्त्री शिक्षा, स्त्री स्वतंत्रता, विधवा-विवाह, समान अधिकार तथा कर्माधारित वर्ण व्यवस्था का समर्थन कर समाज में नवीन चेतना का संचार किया। इस शोध में स्वामी दयानन्द के वैदिक चिंतन, शिक्षा-दर्शन, संस्कार व्यवस्था, यज्ञ की महत्ता, राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार तथा धार्मिक-सामाजिक सुधारों का विवेचन किया गया है। साथ ही उनके प्रमुख ग्रन्थों, शास्त्रार्थों एवं आर्य समाज के माध्यम से भारतीय पुनर्जागरण में दिए गए योगदान का अध्ययन किया गया है। महर्षि दयानन्द ने वेदों को विज्ञान, कर्म, उपासना और ज्ञान का मूल स्रोत मानकर भारतीय समाज को आत्मगौरव, तर्कशीलता एवं नैतिकता की दिशा प्रदान की। यह कहा जा सकता है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती केवल धार्मिक सुधारक ही नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के वैचारिक निर्माता, सामाजिक क्रान्ति के प्रवर्तक तथा राष्ट्रीय चेतना के प्रेरणास्रोत थे। उनके विचार आज भी सामाजिक समता, शिक्षा, राष्ट्रभाषा, स्त्री अधिकार एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं।
मुख्य शब्द: महर्षि दयानन्द सरस्वती, आर्य समाज, वैदिक पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार, स्त्री शिक्षा, वैदिक धर्म, भारतीय पुनर्जागरण, जाति प्रथा, शिक्षा दर्शन, हिन्दी प्रचार, संस्कार व्यवस्था, यज्ञ परम्परा, राष्ट्रचेतना, वैदिक संस्कृति,समाज सुधार आन्दोलन ।
Cite this Article:
डा.मिथलेश गंगवार, “समाज परिवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती” The Research Dialogue, Open Access Peer-reviewed & Refereed Journal, Pp-252–256, Volume-05, Issue-01, April-2026, https://theresearchdialogue.com/
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