The Research Dailogue

समकालीन पारिवारिक संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का प्रामाणिक चित्रण : टूटने के बाद

Vol. 05, Issue 01, pp. 158–164 |  Published: 15 April 2026

Author(s) : अच्युत शुक्ला एवं प्रोफेसर जय शंकर तिवारी

DOI: https://doi.org/10.64880/theresearchdialogue.v5i1.19

सार

           पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में सांस्कृतिक बदलाव की एक ऐसी धारा बही जिसमें कि श्लीलता और अश्लीलता की नयी परिभाषाएँ गढ़ी गईं। एक लंबे अरसे तक हमारी संस्कृति जिसे उचित मानती रही पश्चिमी संस्कृति ने उसे गलत ठहराया और अनुचित की वकालत की। सामाजिक संरचनाओँ में जड़ों तक गहरे पारम्परिक मूल्यों पर कुठाराघात हुआ और वे ढह गए, नए मूल्यों की स्थापना हुई – जो क्रोड में- स्वच्छंदता और उच्छृंखलता को प्रश्रय देने वाले सिद्ध हुए। उपन्यास में बदलते जीवन मूल्यों और बदलती संस्कृति को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है। भारतीय संस्कृति में स्त्री का स्थान तो अत्यंत उच्च माना ही गया है, साथ ही खान-पान में निरामिष भोजन और मदिरा निषेध का भी उचित स्थान रहा है। इधर 21वीं सदी में स्त्रियों ने स्वच्छंदता और स्वतंत्रता के नाम पर जिस उच्छृंखलता को प्रश्रय दिया, यह सोचनीय है। युवा पुरुष मादक एवं नशीले द्रव्यों के सेवन में संलिप्त हैं और इसमें स्त्रियाँ भी पीछे नहीं।

बीज शब्द 21वीं सदी, सांस्कृतिक बदलाव, मूल्य, भारतीय संस्कृति, बिखराव

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शुक्ला,अच्युत एवं तिवारी, प्रोफेसर जय शंकर ,समकालीन पारिवारिक संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का प्रामाणिक चित्रण : टूटने के बादThe Research Dialogue, Open Access Peer-reviewed & Refereed Journal, Pp-158–164,Volume-05, Issue-01, April-2026, https://theresearchdialogue.com/

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